तीन तलाक़ और हलाला के विरोध में अपना खुन सुखा रहे लोगों को "नियोग" प्रथा के बारे में अवश्य जानना चाहिए, कृपया ध्यान दें।
• क्या है नियोग 👇
"मर्द नपुंसक है नामर्द है बच्चा पैदा करने के काबिल नहीं है"
तो उसकी पत्नी को दोसरी शादी करने की आज्ञा नहीँ है ना "तलाक" जैसा कोई नियम है, हां वह औरत किसी भी सेम गोत्र के आदमी से बिना शादी विवाह के हमबिस्तरी करके गर्भ धारण कर सकती है मतलब बच्चा पैदा करने के लिए यह अय्याशी जैसा फार्मूला नियोग कर सकती है :
(हलाला को स्त्री भोग का नाम देने वाले अवश्य पढ़ें)
"धर्म के अनुसार"👇
इस सुविधा को ‘नियोग’ के नाम से जाना जाता है। जिसका आशय किसी भी प्रकार के यौन आनंद से ना होकर सिर्फ और सिर्फ संतान को जन्म देने से है। नियोग के लिए किस पुरुष को चुना जाएगा, इसका निर्णय भी उसका पति ही करता था।
अब यह कौन से थर्मा मीटर से नाप जायेगा कि बिना आनंद के वह आदमी महिला से सम्भोग किया या आनंद लेकर किया ?
"बहुत पुरानी परम्परा है यह"👇
‘नियोग’ भारतीय समाज में व्याप्त एक बेहद प्राचीन परंपरा है, जिसकी उपस्थिति रामायण से लेकर महाभारत काल तक मिलती है। आज भी बहुत से भारतीय समुदायों में ‘नियोग’ द्वारा संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया को पूरी धार्मिक परंपरा के अनुसार अपनाया जा रहा है।
"मनु स्मृति में उल्लेख"👇
सर्वप्रथम नियोग को मनुस्मृति में उल्लिखित किया गया था। जिसके अनुसार यह एक ऐसी प्रक्रिया है जब पति की अकाल मृत्यु या उसके संतान को जन्म देने में अक्षम होने की अवस्था में स्त्री अपने देवर या फिर किसी समगोत्रीय, उच्चकुल के पुरुष के द्वारा गर्भ धारण करती है।
"जरूरी है पति की इच्छा"👇
स्त्री अपने पति की इच्छा और अनुमति मिलने के बाद ही ऐसा कर सकती है। सामान्य हालातों में वह बस एक ही संतान को जन्म दे सकती है लेकिन अगर कोई विशेष मसला है तो वह नियोग के द्वारा दो संतानों को जन्म दे सकती है।
"जायज संतान"👇
नियोग के द्वारा जन्म लेने वाली संतान, नाजायज होने के बावजूद भी जायज कहलाती है। उस पर उसके जैविक पिता का कोई अधिकार ना होकर उस पुरुष का अधिकार कहलाया जाएगा, जिसकी पत्नी ने उसे जन्म दिया है।
"नियोग की शर्तें"👇
नियोग की प्रक्रिया तमाम शर्तों के बीच बंधी है। जैसे कि कोई भी महिला नियोग का प्रयोग केवल संतान को जन्म देने के लिए ही कर सकती है ना कि यौन आनंद के लिए, नियोग के लिए नियुक्त किया गया पुरुष धर्म पालन के लिए ही इसे अपनाएगा, उसका धर्म स्त्री को केवल संतानोत्पत्ति के लिए सहायता करना होगा, संतान के उत्पन्न होने के बाद नियुक्त पुरुष उससे किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं रखेगा।
"वासना रहित"👇
आपको बता दें कि नियोग से पहले संबंधित स्त्री और नियुक्त किए गए पुरुष के शरीर पर घी का लेप लगा दिया जाता था ताकि उनके भीतर किसी भी प्रकार की वासना जाग्रत ना हो सके।
"नियोग की महत्ता"👇
भारतीय पौराणिक इतिहास में नियोग की महत्ता को इस बात से बेहतर समझा जाता है कि जिस प्रकार रामायण के बिना एक आदर्श जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार नियोग के बिना महाभारत की कल्पना कर पाना असंभव है।
"महाभारत में उल्लेख"👇
महाभारत में धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर नियोग से पैदा हुए थे जिसमे ऋषि वेद व्यास नियुक्त पुरुष थे। बाद में, पाण्डु संतान देने में असमर्थ होने के कारण, पाँचों पांडव नियोग से पैदा हुए थे जिसमे प्रत्येक नियुक्त पुरुष अलग-अलग देवता थे।
👉 अब आप ही तय करें की कोई पुरुष जब अपनी पत्नी की महत्वाकांक्षाओं को पुरा करने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से असमर्थ रहता है और इसके बावजूद उसे पती-पत्नी के मिलन का परिणाम बिना किसी क्रियाकलापों के चाहिए होता है तो वह किस प्रकार अपनी पत्नी को किसी दुसरे वयक्ति के साथ हमबिस्तरी का फरमान सुनाता है जिसका अधिकार केवल उसे होता है। तलाक़ और हलाला के शरायत को जाने बगैर दिनभर इस्लामी शरीयत पर ऊंगली उठाने वाले इस प्रक्रिया को क्या कहेंगे ? क्या इस प्रथा द्वारा महिलाओं के अधिकारों का हनन नहीं होता था ?
नोट : कृपया इसे धार्मिक रुप से ना लें बल्कि बौद्धिक रुप से लें,
(पोस्ट के कुछ अंश काॅपी)
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