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Tuesday, 25 April 2017

अमेरिका और उसके खुशी खेल,

"अमेरिका और इसके खुनी खेल"

दुनिया में अबतक आतंकवाद को परिभाषित करने में बड़े से बड़े बुद्धिजीवी भी असफल रहे हैं, एक आतंकवादी देश होने के लिए कितने मासूमों का कातिल होना आवश्यक है यह भी किसी ने नहीं बताया, और अगर कोई इस पैमाने को दर्शाए तो अमेरिका सर्वश्रेष्ठ पर रहेगा, अमेरिका पूरी दुनिया के पैमाने पर आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का दावा करता हैं। लेकिन सच्चाई देखी जाए तो स्वयं अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी देश कहलाएगा। आज जिन इस्लामी कट्टरपन्थियों से लड़ने के नाम पर इराक़, अफगानिस्तान सीरिया और दुनिया के कई देशों में अमेरिका बमबारी, नरसंहार और सैनिक कब्ज़ों, का सिलसिला जारी रखे हुए है, वे उसी के पैदा किये हुए कठपुतली हैं।
ये साम्राज्यवादी खेल बहुत गहरा है, हथियारों का कारोबार कमजोर देशों के बेकसूर नागरिकों के मौत का सबसे बड़ा कारण बना, किस देश का कौन सा हथियार सबसे कारगर है ये दिखाने के लिए "अमेरिका" ने ईराक, अफगानिस्तान, लीबिया जैसे कई देशों पर इसका प्रयोग किया, और इसी के तहत अफगानिस्तान पर एक टन का "मदर ऑफ ऑल बम" गिरा दिया। बताया जा रहा है कि दूसरे विश्‍व युद्ध में जापान पर हुए परमाणु हमले के बाद सबसे बड़ा बम धमाका किया गया है. 14 वर्ष पहले अमेरिका द्वारा बनाया गये इस बम की क़ीमत 314-मिलियन डॉलर है, हीरोशिमा पर गिराए गए बम से इस बम का आकार दोगुना है और यह धमाके पोंइट के 300 मीटर के दायरे में गड्ढा बना देता है और आसपास के हर चीज को तबाह कर देता है, जिसे एक लाख की आबादी वाले जगह पर गिराया गया तो सोचिये की हालात क्या होंगे, 2001 से लेकर अबतक अमेरिकी नेतृत्व में हुए हमले में अफगानिस्तान के अनगिनत बेकसूर लोग मारे जा चुके हैं। अमेरिकी अगुवाई में नाटो सेनाओं ने शादी की पार्टियों तक पर बमबारी की थी, घर-घर की तलाशी ली गयी थी, जेलों में हज़ारों बेगुनाह नागरिक टॉर्चर किये गये थे और तालिबान व अल क़ायदा आतंकियों के छिपे होने के संदेह में गाँव के गाँव तबाह कर दिये गये। और इस बम के गिरने के बाद साफ है की यह सिलसिला अभी तक जारी है।
आप ही सोचिये की एक लाख की आबादी वाले जगह पर बम गिराकर क्या संदेश दिया गया की आईएसआई का खौफ बना रहे ? दुनिया को अमेरिका के ताकत का एहसास बरकरार रहे ? अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया और पूरी दुनिया में पहले समस्याएं पैदा करना और फिर उन्हें खत्म करने के नाम पर बम चलाना कोई शांतिप्रिय देश की निशानी तो नहीं ? बम शांति का नहीं, अशांति और हिंसा का अस्त्र है जिसका प्रयोग उसने समय-समय पर अपने मफाद के लिए किया है जिससे लाखों मासुमों की जानें गईं हैं, अमेरिका अपने साम्राज्यवादी अस्तित्व को बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, अबतक अमेरिका द्वारा किये गये इन हमलों का जायजा लिया जाए तो आपको समझ आएगा की यह देश किसी का सगा नहीं है, यह अपना मफाद सोचता है और इन इन हमलों के जरिए वह आतंकवाद का किस प्रकार से जन्नी रहा है ,

● 1846-1848 के दौरान अमेरिकी सेनाओं ने मेक्सिको पर हमला करके मेक्सिकी बन्दरगाहों की घेरेबन्दी कर ली और मेक्सिको सिटी पर कब्ज़ा कर लिया। बदले में मेक्सिको को अपना बहुत बड़ा भूभाग अमेरिका को देना पड़ा जिसमें न्यू मेक्सिको, कैलिफोर्निया और उत्तरी मेक्सिको का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल था।

● 1898 में क्यूबा की स्वतन्त्रता को समर्थन देने की आड़ में अमेरिका ने प्रशान्त महासागर और कैरीबियन में स्थित स्पेनी सेनाओं पर हमला किया और उन्हें पराजित करने के बाद स्पेनी उपनिवेशों — क्यूबा, प्यूर्टोरिको, गुआम और फिलिप्पीन्स पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया

● 1899 में फिलिप्पीन्स की उपनिवेशवाद-विरोधी शक्तियों को अमेरिका ने निर्दयतापूर्वक कुचल दिया। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन के शब्दों में, ”…उन्हें दफ्न कर दिया गया, उनके खेतों को तबाह कर दिया गया, गाँवों को जला दिया गया, विधवाओं और अनाथ बच्चों को घरों से बाहर धकेल दिया गया, दर्जनों देशभक्त नेताओं को देश निकाला दे दिया गया और बचे हुए लाखों फिलिप्पीन्स निवासियों को ग़ुलाम बना लिया गया।”

● 1915 में अमेरिका ने हैती पर हमला करके कब्ज़ा कर लिया। अमेरिकी नौसैनिक सीधे हैतियन नेशलन बैंक में पहुँचे और सोने का समूचा आरक्षित भण्डार उठाकर न्यूयॉर्क सिटी पहुँचा दिया। प्रतिरोध को अमेरिकी सेना ने बर्बरतापूर्वक कुचल दिया। नेताओं की हत्या कर दी गयी, बस्तियाँ जलाकर ज़मींदोज़ कर दी गयीं और 15,000 से 30,000 के बीच हैतीवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया।

● 1921 में पुलिस, कू-क्लक्स-क्लान के फासिस्ट गुण्डों और श्वेत नस्लवादियों की एक भीड़ ने तुल्सा (ओक्लाहामा) में अश्वेत आबादी पर हमला बोलकर सैकड़ों लोगों को मार डाला और घरों को लूट लिया। फिर अमेरिकी पुलिस ने छ: जहाज़ों से बम गिराकर पूरी बस्ती को जला कर ख़ाक कर दिया।

● 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध के अन्त में, जब जापान की पराजय आसन्न थी, उस समय अपनी साम्राज्यवादी चौधराहट सिद्ध करने और समाजवादी शिविर को आतंकित करने के लिए, अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये। इसमें 2 लाख नागरिक तुरन्त मारे गये। लाखों की आबादी वर्षों तक विकिरण जनित बीमारियों से घुट-घुटकर मरती रही और दशकों तक विकलांग बच्चे पैदा होते रहे। टोक्यो पर बमबारी से लगी आग में हज़ारों लोग मारे गये और लाखों बेघर हो गये।

● 1950-1953 के दौरान कोरिया पर हमले के दौरान अमेरिका ने जितने बम और तोप के गोले बरसाये, उतना उसने पूरे दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भी नहीं इस्तेमाल किया था। अमेरिकी वायुसेना के जनरल कर्टिस ल में ने दावा किया था कि अमेरिकी जहाज़ों ने बमबारी करके उत्तर कोरिया के हर छोटे-बड़े शहर को जलाकर खाक कर दिया था।

● 1965-1975 के दौरान वियतनामी जनता के मुक्तियुद्ध को कुचलने की कोशिशों के दौरान अमेरिका ने वियतनाम तथा पड़ोसी देशों – कम्पूचिया और लाओस पर कुल 70 लाख टन बम गिराये थे। हज़ारों गाँव सेना ने उजाड़ दिये। ‘माई लाई नरसंहार’ जर्मन नात्सियों द्वारा किये जाने वाले नरसंहारों जैसी ही बर्बर घटना थी। वियतनामी मुक्तियुद्ध के इन दस वर्षों के दौरान लगभग 30 लाख वियतनामी मारे गये।

● 1965 : 20,000 अमेरिकी नौसैनिकों ने एक क्रान्तिकारी विद्रोह को कुचलने के लिए हमला किया जिसमें 6000 से 10,000 के बीच डोमिनिकन गणराज्य के लोग मारे गये।

● 1878-1944 के दौरान अमेरिका-प्रायोजित मृत्यु-दस्ते (डेथ स्क्वाड) की सत्ता ने 400 माया (मूल निवासी) गाँवों को उजाड़ दिया। नृशंसता और यातना की जघन्यतम मिसालें कायम की गयीं और ग्वाटेमाला की दसियों हज़ार ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया गया।

● 1989 मे एक अमेरिकी हमले के दौरान पनामा में 2000 से 6000 के बीच लोग मारे गये। इनमें ज़्यादातर ग़रीब और मज़दूर बस्तियों के लोग थे जिन्हें सामूहिक क़ब्रों में दफ्न कर दिया गया।

● ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म के तहत 1991 में इराक पर पहले अमेरिकी हमले के दौरान लाखों लोग मारे गये या घायल हुए। हमले के दौरान, सिर्फ एक राजमार्ग पर भागते हुए (जिन्हें बाद में ”हाइवे ऑफ डेथ” नाम से ख्याति मिली) 48 घण्टों के भीतर 25,000 नागरिक और सैनिक मारे गये थे।

● 1993 में अमेरिकी सेना के हेलिकॉप्टर ने सोमालिया के एक भीड़ पर मिसाइल दागा जिससे 100 निहत्थे लोग मारे गये और कई घायल हुए। ग्रामीणों की फसलें और घर जला दिये गये और मवेशी मार दिये गये।

● 1988 में अमेरिकी सेना ने ईरानी क्षेत्र के ऊपर उड़ रहे एक ईरानी यात्री विमान को मार गिराया जिसमें सवार कुल 290 यात्री (66 बच्चों सहित) मारे गये। अमेरिका ने इस घटना पर कोई खेद नहीं जताया। तत्कालीन राष्ट्रपति एच.डब्ल्यू. बुश ने कहा, ”अमेरिका की ओर से मैं कभी भी माफी नहीं माँगूगा। तथ्य जो भी हों, मैं उनकी परवाह नहीं करता।

● 2003 से अब तक संहारक रासायनिक हथियार रखने (जो कभी नहीं मिले) और अल क़ायदा से साठगाँठ (जो कभी साबित नहीं हुआ) का आरोप लगाकर अमेरिका ने इराक़ पर कब्ज़ा जमाया। इस दूसरे इराकी युद्ध और अमेरिकी कब्जे क़े दौरान एक लाख इराकी नागरिक मारे जा चुके हैं और 40 लाख अपने घरों से उजड़ने को मजबूर हुए हैं।

● 2009 से लेकर अब तक ड्रोन नामक मानवरहित विमानों से आतंकवादियों के सफाये के नाम पर किये जाने वाले हमलों में, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और यमन में हज़ारों निर्दोष नागरिक मारे जा चुके हैं और बस्तियों की भारी तबाही हुई है।

● लगातार सीरिया पर हवाई हमले किये जा रहे हैं जिनमें आए दिन बेकसूर मारे जा रहे हैं जिसकी सराहना क्रेडिट ट्रंप लेते हैं और मिडिया उसकी सराहना करती है।

इस दुनिया में तीन-चौथाई से ज्यादा आतंक, धार्मिक कट्टरता और युद्धों के लिए सिर्फ एक ही ताकत जिम्मेदार है और उसका नाम है "अमेरिका" और जो लोग अफगानिस्तान में गिराये उसके बम की सराहना कर रहे हैं, वे सचमुच बड़े निर्दयी हैं, उन्हे इंसान के रुप में मासुमों के लहु नजर नहीं आते हैं, क्या उन्हे उपरोक्त दर्शाए गए देशों पर भी अमेरिकी हमले सही लगते हैं ? और करीब 20 देश हैं जिनपर अमेरिकी हमले और सी.आई.ए. से सहायता-प्राप्त सैन्य कार्रवाइयाँ और कठपुतली सत्ताओं द्वारा छेड़े गये युद्ध भी शामिल हैं जिन्हे मेंशन कर पाना मुश्किल है, आप ही बताइए की कत्लो गारत की इन दासतानो के बावजूद आप अमेरिका को आतंकवादी देश नहीं कहते आखिर क्यों ? अगर आपको लगता है कि अमेरिका मुसलिम विरोधी है तो उपरोक्त देशों में उसके जरिए किये गये जुल्म के रेशयु को देख कर बताइए की सबसे अधिक किस धर्म पर उसकी बर्बरता बरसती रही है ? ये वही देश है न जिसकी नजर में नेल्सन मंडेला एक समय में अपराधी थे, और फिर बाद में इनहोने ही इनको नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया, मतलब यह देश जब चाहे जिसे भी आतंकवादी डिक्लेअर कर दे, और जब चाहे नोबेल पुरुष्कार से सम्मानित कर दे।
आप कब समझोगे इस साम्राज्यवादी हस्तक्षेप को और कब इनके और इनके बमबारी का विरोध करेगे ? वक्त का इशारा है की समझिए इस खेल को और अपने नफरत को इनके द्वारा किसी पर हावी होने से रोक लिजिये।

शुक्रिया

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