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Tuesday, 25 April 2017

लिब्रल बाबु जब पहलु खान मारा गया तब तुम कहाँ थे ?

लिब्रल बाबु सुनो,

आपको मोहसिन शैख याद है ? हाँ वही एक सीधा सादा मुसलमान जो मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर घर आ रहा था और तभी देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था को पैरों तले रौंदते हुए "हिन्दू सेना" के गुंडों ने अपना गुस्सा उतारने के लिए उस निहत्थे बेकसूर "मोहसिन" की हाॅकी स्टिक और लोहे की राॅड से पीट पीट कर हत्या कर दी थी, जानते हो वजह क्या थी ? एक संघी ने फेसबुक पर नेहाल खान नाम की आईडी बनाकर बाल ठाकरे की एडिट की हुयी फ़ोटो पोस्ट कर दी थी। उसे कुछ हुआ तो नही पर उसका बदला मोहसिन से लिया गया। इसके बाद ना ही देश की मिडिया ने इस खबर को प्रमुखता दी और ना ही किसी राजनीतिक पार्टी ने, आप खुद चुप रहे, कुछ नहीं बोले, जानते हो इसका परीणाम क्या आया ?
बाम्बे उच्च न्यायालाय ने मोहसिन शैख के हत्यारों को ज़मानत दे दी, हालांकि अदालत ने यह स्विकार किया कि "मोहसिन" इन्नोसेन्ट था। इन्नोसेंट का अर्थ बेगुनाह, निर्दोष, बेकसूर, मासुम ही होता है ना ? लेकिन  मोहसिन के हत्यारे उसी न्यायधीश के द्वारा इस कारण जमानत पा गये कि वह इस्लाम से चिढ़ रखने के कारण मोहसिन की हत्या करने का अपराध किए, तब तो आप चुप रहे।

लिब्रल बाबु सुनो न,

आपको मिन्हाज अंसारी याद है ? हाँ झारखंड का वही मुस्लिम शख्स जिसे पुलिस ने अपनी बर्बरता के जरिए मार डाला था, अपने परीवार का एकलौता कमाने वाला अपने धर्म के कारण नफ़रत का शिकार हो गया और उसका सारा परिवार मानो टुट सा गया, छोटे-छोटे बच्चे यतीम हो गए, मुस्लिम महिलाओं की इज्जत करने वाले देश में एक मुस्लिम औरत बेवह हो गई, जानते हैं मिन्हाज का कसुर क्या था ? उसने फेसबुक पर ही गोश्त की तस्वीर पोस्ट की थी, मतलब गोश्त न हुआ हथियारों के जखीरे की तस्वीर पोस्ट कर दी हो जिसके कारण पुलिस ने उसके गैंग की जानकारी लेने के लिए सख्ती बरती हो और मिन्हाज उसे बर्दाश्त न कर सका हो, ऐसा तो बिलकुल नहीं था न ? तो क्यों मारा गया था मिन्हाज को ? किस मिडिया ने उसके लिए पैनल बैठाए ? किस मानवतावादी संगठन ने उसका साथ दिया ? अब तक इंसाफ तो छोड़िए उसके कातिलों पर कारवाई भी नहीं हुई, तब आप कहाँ थे ? आप की जबान में किस पान का कत्था रंग भरने के लिए कचुही मार रहा था जिस वजह से आपके मुंह तक ना खुले ?

लिब्रल बाबु,

आज तुम्हारी जबान खुली है, आज तुम विधवा विलाप कर रहे हो, और हैरत की बात यह है कि एक मुस्लिम के लिए ही तुम आज लहु के आंसू बहा रहे हो, लेकिन वो भारतीय नहीं बल्कि पड़ोसी देश का है जिसका नाम "मशाल खान" है, जो की एक मास कम्युनिकेशन का छात्र था जिसने सोशलमीडिया पर मोहसिन (निर्दोष) और मिन्हाज की तरह ही ऐसा मटेरियल पोस्ट किया जिससे लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं और उसे पीट पीट कर मार दिया गया, हाँ यह एक बेहद निन्दनीय घटना है और इसकी जितनी निन्दा की जाए कम है।

परन्तु ऐसे ही जब भारत में मोहसिन और मिन्हाज मार दिए गये तब तुम कहाँ थे ? सोचो की "मशाल खान" की हत्या हुई तो वहाँ के प्रधानमंत्री तक ने निंदा की परन्तु भारत में अबतक ना जाने कितने मुसलमान ऐसे ही उग्र भीड़ का शिकार हुए जिनमें अखलाक , मिन्हाज , अयूब , नजीब , मेवात की वो दो बहने, फरीद , मजलूम , छोटू , ज़ाहिद , बिजनौर, पहलूखान इत्यादी शामिल हैं, तब तो भारत के प्रधानमंत्री तक चुप्पी साधे रहे। आप तो खैर सेक्युलरिज्म के अलमबरदार ठहरे तो आप को ये सारी मौतें नहीं दिखीं, यहाँ "मशाल खान" पर आपकी इंसानियत जाग गई, कयोंकि वो भारतीय नहीं है, हाँ मशाल की हत्या करने वाले निश्चित रूप से गलत थे, ऐसी हिंसा को किसी भी कारण उचित नहीं ठहराई जा सकती परन्तु एक पर हो हल्ला मचाया और कईयों को छोड़ दिया, ये डबल स्टैण्डर्ड कयों ?

दरअसल तुम्हारा ये जो दोहरा चरित्र है ना वो तुम्हारे दोगलेपन को परिभाषित करती है, हकीकत तो यह है की जब सेकुलरिज्म, लिब्रिज्म, फेमिनिज्म, नास्तिकता इत्यादी आपस में मिलकर सहवास करते हैं तो परिणाम स्वरूप तुम्हारी जैसी मानसिकता का जन्म होता है।

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