Pages

Monday, 8 May 2017

सभी मसलक के उलेमा आए एक मंच पर, की मुस्लिम हुकुक की बातें और दिए शांति के पैगाम

झारखंड के जमशेदपुर में रविवार की शाम बेहद खास थी जब एक ही मंच को हर मकतब-ए-फिक्र के उलेमाओं ने साझा किया और देश में मुसलमानों के साथ हो रहे बर्बरता पर अपनी अपनी बातें रखते हुए एक शांतिपूर्ण महासभा का सफल आयोजन किया।

दरअसल मुसलमानों को मोत्तहिद करने के लिए जमशेदपुर में "मुस्लिम एकता मंच" का गठन किया गया है जिसमें तमाम मसलक के उलेमा हजरात मिलकर क़ौमी फिक्र को अंजाम दे रहे हैं, इसी के तहत मुस्लिम एकता मंच ने रविवार 7 मई की शाम को जमशेदपुर स्थित गाँधी मैदान में एक इंसाफ महासभा का आयोजन किया, इससे पहले बजरंगदल द्वारा इस महासभा के आयोजन पर रोक लगाने के कई प्रयास किए जा चुके थे लेकिन उलेमाओं और इंसाफ महासभा के वाॅलेंटियर बाबर खान, फिरोज खान, शेख फरीद इत्यादी की जमीनी मेहनत रंग लाई और इंसाफ महासभा को जमशेदपुर उपायुक्त की हरी झंडी मिली।

इस महासभा में तमाम मसलक के उलेमाओं समेत जमशेदपुर और इसके आसपास के लगभग 60 हजार से अधिक लोग गाँधी मैदान पहूंचे, जैसे मानो एक जन सैलाब उमड़ पड़ा था, सभी के हाथों में तिरंगा था, स्टेज भी राष्ट्र ध्वज की तरह सजी थी, गंगा जमुना संस्कृति को दर्शाते सड़कों के किनारे  दुकानदार और बहुसंख्यकों की भीड़ भी काफी तादाद में थी, इसके बाद उलेमाओं की तकरीर शुरु हुई, जिनमें निम्न बातें कहीं गई।

- मुस्लिम युवाओं को आतंक से जोड़कर देखा जाता है। गोहत्या के आरोप में हमले हो रहे हैं। जो मुजरिम हैं उसे सूली पर चढ़ा दो, लेकिन हर मुसलमान को दाउद न समझा जाए।
- जंग-ए-आजादी में मुसलमानों ने भी कुर्बानी दी है। इस्लाम अमन का संदेश देता है, इसलिए किसी भी सूरतेहाल में युवा हिंसा की राह पर न जाएं। और सरकार हमें आतंकवाद की नजर से न देखें, हम अपने वतन के रखवाले हैं।
- मुसलमानों का डीएनए भारतीय मूल का है, चाहो तो इसे टेस्ट करा लें।
- हम हिंसा से परे कानुन को तरजीह दी है, हमें देश के न्याय प्रणाली पर विश्वास है, परंतु आए दिन मुसलमानों के प्रति दोहरी नीति इसकी विश्वसनीयता को खोखली कर रही है।
- आजादी में हमने बढकर बहाया है खुन, अधिकारों में कटौती मंजुर नहीं।

आज भले ही हम उलेमाओं को लाख बुरा-भला कह लें, लेकिन सच यही है की आज भी क़ौम की ख़िदमात जो वो लोग कर रहे हैं उसकी मिसाल नही मिलती, जमशेदपुर इसका जीता-जागता उदाहरण है,

इस महासभा ने उस वक्त सबका ध्यान आकर्षित किया जब तमाम मसलक के उलेमाओं समेत सभी लोगों ने मगरिब की नमाज़ एक ही मैदान में कंधे से कंधा मिलाकर पढ़ा, और मुल्क के अमन-ओ-सुकुन के लिए दुआएं माँगी ,  और फिर हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारों से पुरा मैदान गुंजने लगा।

बेशक यह एक सराहनीय प्रयास है कौम को फिरकापरस्ती से दुर एक सही राह दिखाने की, मोत्तहिद होकर अपने हुकुक के लिए आवाज़ बुलंद करने की, ये एक सदा है जो केवल जमशेदपुर तक सीमित नहीं रहनी चाहिये बल्कि इसकी गुँज देश के कोने-कोने तक पहुंचनी चाहिए ताकि हम मुसलमान एक हो जाएँ, इंशाअल्लाह उलेमाओं की यह मेहनत जरुर रंग लाएगी।

- अशरफ हुसैन

Tuesday, 25 April 2017

बहुसंख्यक समुदाय में एक से अधिक शादी वाले लोग अधिक हैं।

कितने ऐसे लोग हैं जो किसी ऐसे मुस्लिम वयक्ति को जानते हैं जिन्होंने चार पत्नियां रखी हैं ? मेरे ख्याल से कोई भी नहीं होगा, दरअसल हकीकत में भी एक से अधिक पत्नी रखने वालों में बहुसंख्यक वर्ग के लोग आगे हैं, आपको उस समय की जनसंख्या के आंकड़े पेश कर रहा हूँ जब ये तीन तलाक़ एंव महिला अधिकार के बारे में कोई हलचल नहीं थी,
वर्ष 1960 में की गई जनसंख्या गणना के मुताबिक़ भारतीय मुस्लिमों की तुलना में हिंदुओं ने एक से ज्यादा पत्नी रखने की प्रथा को बढ़ावा दिया है। उस वक्त के दर्ज आंकड़े बयां करते हैं कि एक से ज्यादा बीवियां रखने के मामले में आदिवासी 15.25, बौद्ध 7.9, हिंदू 5.80 और भारतीय मुस्लिम 5.78 फीसदी थे। इन आंकड़ों पर गौर करने पर साफ जाहिर होता है कि भारतीय मुस्लिमों में चार शादियां जायज होने के बाद भी वे एक पत्नी की प्रथा का पालन करने में सबसे आगे रहे हैं। वहीं, अगर आदिवासियों के आंकड़ों को हिंदुओं की प्रतिशत से जोड़ दिया जाए तो वह 21.05 फीसदी का आंकड़ा छू लेता है। यानी एक से ज्यादा पत्नी रखने के मामले में हिंदुओं ने मुस्लिमों को काफी पीछे छोड़ रखा है। इसके बाद से अबतक कोई भी सम्पुर्ण आंकड़ा पेश नहीं हुआ है, वजह तो आप समझ ही गए होंगे की इन आंकड़ों में कितनी वृद्धि हुई होगी।
लेकिन इसपर किसी मिडिया या किसी सियासतदानों की कभी बोली नहीं निकली, आखिर क्यों ?

तीन तलाक़ पर चर्चा से पहला नियोग पर चर्चा कर लें, जाने क्या है नियोग प्रथा,

तीन तलाक़ और हलाला के विरोध में अपना खुन सुखा रहे लोगों को "नियोग" प्रथा के बारे में अवश्य जानना चाहिए, कृपया ध्यान दें।

• क्या है नियोग 👇

"मर्द नपुंसक है नामर्द है बच्चा पैदा करने के काबिल नहीं है"
तो उसकी  पत्नी को  दोसरी शादी करने की आज्ञा नहीँ है ना "तलाक" जैसा कोई नियम है, हां वह औरत किसी भी सेम गोत्र के आदमी से बिना शादी विवाह के हमबिस्तरी करके गर्भ  धारण कर सकती है मतलब बच्चा पैदा करने के लिए यह अय्याशी जैसा फार्मूला नियोग कर सकती है :

(हलाला को स्त्री भोग का नाम देने वाले अवश्य पढ़ें)

"धर्म के अनुसार"👇

इस सुविधा को ‘नियोग’ के नाम से जाना जाता है। जिसका आशय किसी भी प्रकार के यौन आनंद से ना होकर सिर्फ और सिर्फ संतान को जन्म देने से है। नियोग के लिए किस पुरुष को चुना जाएगा, इसका निर्णय भी उसका पति ही करता था।
अब यह कौन से थर्मा मीटर से नाप जायेगा कि बिना आनंद के वह आदमी महिला से सम्भोग किया या आनंद लेकर किया ?

"बहुत पुरानी परम्परा है यह"👇

‘नियोग’ भारतीय समाज में व्याप्त एक बेहद प्राचीन परंपरा है, जिसकी उपस्थिति रामायण से लेकर महाभारत काल तक मिलती है। आज भी बहुत से भारतीय समुदायों में ‘नियोग’ द्वारा संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया को पूरी धार्मिक परंपरा के अनुसार अपनाया जा रहा है।

"मनु स्मृति में उल्लेख"👇

सर्वप्रथम नियोग को मनुस्मृति में उल्लिखित किया गया था। जिसके अनुसार यह एक ऐसी प्रक्रिया है जब पति की अकाल मृत्यु या उसके संतान को जन्म देने में अक्षम होने की अवस्था में स्त्री अपने देवर या फिर किसी समगोत्रीय, उच्चकुल के पुरुष के द्वारा गर्भ धारण करती है।

"जरूरी है पति की इच्छा"👇

स्त्री अपने पति की इच्छा और अनुमति मिलने के बाद ही ऐसा कर सकती है। सामान्य हालातों में वह बस एक ही संतान को जन्म दे सकती है लेकिन अगर कोई विशेष मसला है तो वह नियोग के द्वारा दो संतानों को जन्म दे सकती है।

"जायज संतान"👇

नियोग के द्वारा जन्म लेने वाली संतान, नाजायज होने के बावजूद भी जायज कहलाती है। उस पर उसके जैविक पिता का कोई अधिकार ना होकर उस पुरुष का अधिकार कहलाया जाएगा, जिसकी पत्नी ने उसे जन्म दिया है।

"नियोग की शर्तें"👇

नियोग की प्रक्रिया तमाम शर्तों के बीच बंधी है। जैसे कि कोई भी महिला नियोग का प्रयोग केवल संतान को जन्म देने के लिए ही कर सकती है ना कि यौन आनंद के लिए, नियोग के लिए नियुक्त किया गया पुरुष धर्म पालन के लिए ही इसे अपनाएगा, उसका धर्म स्त्री को केवल संतानोत्पत्ति के लिए सहायता करना होगा, संतान के उत्पन्न होने के बाद नियुक्त पुरुष उससे किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं रखेगा।

"वासना रहित"👇

आपको बता दें कि नियोग से पहले संबंधित स्त्री और नियुक्त किए गए पुरुष के शरीर पर घी का लेप लगा दिया जाता था ताकि उनके भीतर किसी भी प्रकार की वासना जाग्रत ना हो सके।

"नियोग की महत्ता"👇

भारतीय पौराणिक इतिहास में नियोग की महत्ता को इस बात से बेहतर समझा जाता है कि जिस प्रकार रामायण के बिना एक आदर्श जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार नियोग के बिना महाभारत की कल्पना कर पाना असंभव है।

"महाभारत में उल्लेख"👇

महाभारत में धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर नियोग से पैदा हुए थे जिसमे ऋषि वेद व्यास नियुक्त पुरुष थे। बाद में, पाण्डु संतान देने में असमर्थ होने के कारण, पाँचों पांडव नियोग से पैदा हुए थे जिसमे प्रत्येक नियुक्त पुरुष अलग-अलग देवता थे।

👉 अब आप ही तय करें की कोई पुरुष जब अपनी पत्नी की महत्वाकांक्षाओं को पुरा करने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से असमर्थ रहता है और इसके बावजूद उसे पती-पत्नी के मिलन का परिणाम बिना किसी क्रियाकलापों के चाहिए होता है तो वह किस प्रकार अपनी पत्नी को किसी दुसरे वयक्ति के साथ हमबिस्तरी का फरमान सुनाता है जिसका अधिकार केवल उसे होता है। तलाक़ और हलाला के शरायत को जाने बगैर दिनभर इस्लामी शरीयत पर ऊंगली उठाने वाले इस प्रक्रिया को क्या कहेंगे ? क्या इस प्रथा द्वारा महिलाओं के अधिकारों का हनन नहीं होता था ?

नोट : कृपया इसे धार्मिक रुप से ना लें बल्कि बौद्धिक रुप से लें,

(पोस्ट के कुछ अंश काॅपी)

तुम अपने परवरदिगार के कौन कौन सी नेमतों को झुटलाओगे ?

"तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे"

चलो माना तुम्हे इस्लाम धर्म पसंद नहीं, तुम नास्तिक बनना चाहते हो या तुम बन चुके हो, माजाअल्लाह तुम्हे सुरह इखलास की आयत पर यकीन नहीं जिसमें साफ़ लिखा है की "अल्लाह वाहिद है" , तुम्हे कल्मा-ए-तौहीद के उन अल्फाजो पर यकीन नहीं जिसमें साफ लिखा है की वो "लाशरीक" है, तुम्हे रसुल अल्लाह सल्ललाहु अलैहिवसल्लम से और सहाबी ए रसुल से बुग़्ज है, तुम्हे इस्लाम और इस्लामी शरीयत से बैर है, तुम इस्लामी कवानीन को बदलना चाहते हो, जिसके लिए तुम किसी भी हद तक गिर सकते हो।
तो सुनो ये इस्लाम और इसके निज़ाम दुनिया वालों ने नहीं बल्कि खुद रब्बे जुलजलाल ने तय किया है, जिसे कोई नहीं बदल सकता, हाँ तुम्हे ये पसंद नहीं बल्कि नास्तिकता पसंद है तो बेशक तुम जाओ और नास्तिक बन जाओ लेकिन उस्से पहले मेरे कुछ सवालों के जवाब दो, तुमने कुरआन की सुरह रहमान तो पढ़ा ही होगा, जिसमें तुमसे पुछा जा रहा है कि "तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे"। आज मैं भी कुछ पुछना चाहता हूँ उस परवरदिगार की नेमतों के बारे में जिसे तुम अंदेखा कर नास्तिकता को महत्व दे रहे हो।

- तुम्हे किसने सिखाया की सबसे अच्छा आदमी वो है जो औरतों के साथ सबसे अच्छा सुलूक करता है, तुम्हे किसने सिखाया की विधवाएं मनहूस नहीं होती इन्हें भी एक बेहतर जीवन जीने का पूरा अधिकार है। इसलिए विधवाओ और उनके बच्चों को अपनाओ।
बताओ की ये सीख तुम्हारे लिए नेमत नहीं तो और क्या है ? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया की जब नमाज पढ़ो तो एक दूसरे से कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़े रहो क्योंकि तुम सब आपस मे बराबर हो तुम में से कोई छोटा या बड़ा नहीं हैं। समानता की शिक्षा देना नेमत है न नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया की अपने पड़ोसियों से अच्छा बर्ताव करो चाहे तुम उन्हें जानते हो या न जानते हो। और खुद खाने से पहले अपने पड़ोसी को खाना खिलाओ। पड़ोसी की मदद की सीख तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं?  तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि शराब और जुआ सारी बुराइयों की जड़ है। इनसे अपने आप को दूर रखे। समाज में मौजूद बुराइयों को समाप्त करने की तालीम तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि मजदूर का पसीना सूखने से पहले पहले उसकी मजदूरी दे दी जाए। और कभी किसी गरीब और अनाथ की बद्दुआ न लेना नहीं तो बरबाद हो जाओगे। ऐसी सीख तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि अपने आप को जलन (ईर्ष्या) से दूर रखो क्योंकि ये तुम्हारे (नेकियों) अच्छे कामों को ऐसे बरबाद कर देती हैं जैसे दीमक लकड़ी को। ऐसी शिक्षा देना एक नेमत है की नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि तुम्हारी मेहनत की कमाई से 2.5% गरीबों को देना जरूरी है। तुम लोगों की मदद करोगे तो खुदा तुम्हारी मदद करेगा। और जो कुछ भी तुम अपने लिए चाहते हो वही सबके लिए भी चाहो तो ही एक सच्चे मुसलमान बन सकते हो। ऐसी शिक्षा देना एक नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि तुम एक महीने तक सुबह से शाम भूखे और प्यासे रहो ताकि तुम्हें एहसास हो सकें कि भूख और प्यास क्या होती हैं। और खुदा के द्वारा दी गई नेमतों का एहसास दिलाना तुम्हारे लिए नेमत है की नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि तुम्हारे घर बेटी पैदा हो तो दुखी मत होना क्योंकि बेटियाँ तो खुदा की रहमत (इनाम) हैं। और जो व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई से अपनी बेटी की परवरिश करें और उसकी अच्छे घर में शादी कराएँ तो वो जन्नत (स्वर्ग) में जायेगा। ऐसी शिक्षा देना तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि माँ बाप और बुजुर्गों का सम्मान करना मानों खुदा का सम्मान करने जैसा हैं। अगर तुम जन्नत (स्वर्ग) में जाना चाहते हो तो अपने मा बाप को हर हाल में खुश रखो उनका फरमाबरदार बनो। ऐसी शिक्षा देना तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि अगर खुश रहना चाहते हो तो किसी अमीर को मत देखो बल्कि गरीब को देखो तो खुश रहोगे। और लोगों से अच्छा बर्ताव करना सबसे बड़ा सवाब का काम हैं। ऐसी शिक्षा तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं ? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि हमेशा नैतिकता और सच्चाई के रास्ते पर चलो। कुछ बोलो तो सच बोलो, वादा करो तो निभाओ और कभी किसी का दिल मत दुखाओ। ऐसी शिक्षा देना तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि सबसे बुरी दावत वह हैं जिसमें अमीरों को तो बुलाया जाता हैं परन्तु गरीबों को नहीं बुलाया जाए, अनाज को बरबाद न किया जाए और पानी को ज़रूरत तक ही इस्तेमाल(उपयोग) करना। और बिना वजह पानी का दुरूपयोग करना गुनाह (पाप)। ऐसी शिक्षा देना तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया की रास्ते में अगर कोई तक़लीफ़ देने वाली चीज (पत्थर,कील,) होतो उसे किनारे करना जिससे दुसरो को तकलीफ न हो। ऐसी शिक्षा देना तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

- तुम्हे किसने सिखाया कि नामहरम महिलाओ/मर्दों पर नज़र पड़े तो आँखें नीची कर लो क्योंकी गैर महिला/पुरुष को देखना गुनाह है। ऐसी शिक्षा देना तुम्हारे लिए नेमत है या नहीं? तो तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेमत को झुटलाओगे ?

दरअसल इस्लाम एक दरख्त है और तुम उसके शाख के एक सुखे हुए पत्ते हो, इस दुनिया में पेड़ पौधे भी खुदा की इबादत करते हैं और जो उसकी इबादत करना छोड़ देता है उसे जानवरों का खोराक बना दिया जाता है, मतलब तो आप समझ ही गए होंगे नास्तिक बाबु ? अगर नहीं समझे तो सुनो, विश्व स्वास्थ्य संगठन के दो विषेशज्ञ "डाक्टर जोस मैनुएल" और शोधकर्ता "अलइसंद्रा फिलिश्मान" के अध्ययन में यह बात आई सामने आई थी कि आत्महत्या और धर्म के बीच गहरा सम्बंध है, इस प्रकार कि (नास्तिकता) उसे केवल एक तत्व बना देती है जिस में सुख,चैन और खुशी नाम की कोई चीज़ नहीं रह जाती है, नास्तिक का ईमान रब के वजूद पर नहीं होता, इस लिये वह बिना रब और उस के अज़ाब से डरे जब जो चाहे जैसा चाहे करता रहता है, जो मानव की हलाकत और उस की बरबादी तक ले जाती है, जब कि ऐसा करना अल्लाह तआला का इन्कार और उस का हक़ दूसरों को देने जैसा है, यही कारण है कि नास्तिक विचारकों, ज्ञानियों और नास्कित कवियों ने अधिकतर आत्महत्यायें की हैं, इतिहास इस की गवाह है और तारीख में यह चीज़ें भरी पड़ी हैं अर्थात अध्ययनों से भी यह चीज़ साबित है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के दोनों विशेषज्ञों के अध्ययन में यह बात आई है कि अधिक आत्महत्या करने वाले नास्तिक ही हैं। बाकी समझाना तो व्यर्थ ही है आपको।

फिर भी पढ़ने के लिए शुक्रिया..........

नमाज़ कायम करो, फिर देखो

हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बडी मुहब्बत थी, हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जब विसाल हो गया तो आप मदीने की गलियों मे यह कहते फिरते थे कि लोगो तुम ने कही रसूलुल्लाह को देखा है तो मुझे भी दिखा दो या मुझे आपका पता बता दो, फिर आप ईस जुदाई के ग़म में मदीना को छोडकर मुल्के शाम के शहर हल्ब में चले गये।
एक साल के बाद आपने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ख्वाब में देखा, हुजूर ने आप से फरमाया कि ऐ बिलाल तुमने हमसे मिलना क्यो छोड दिया ? क्या तुम्हारा दिल हमसे मिलने काे नहीं चाहता ? हजरत बिलाल यह ख़्वाब देखकर "ऐ आका गुलाम हाजिर है" कहते हुए उठे और उसी वक्त रात को ऊंटनी पर सवार होकर मदीने को चल पडे, रात दिन बराबर चलकर मदीना मुनव्वरा में दाखिल हुए हजरत बिलाल पहले सीधे मस्जिदे नब्वी में पहुंचे, हुजूर को ढूंढा मगर हुजूर को न देखे फिर हुजरों में तलाश किया, जब वहां भी न मिले तो मजा़र अनवर पर हाजिर हुए और रोकर अर्ज किया या रसूलल्लाह, हब्स से गुलाम को यह फरमाकर बुलाया कि हमसे मिल जाओ और जब बिलाल ज्यारत के लिए हाजिर हुआ तब हुजूर पर्दे में छुप गये, यह कहकर आप क़ब्रे अनवर पर गिर गये, बहुत देर में जब आपकाे होश आया तो लोग कब्रे अनवर से उठाकर बाहर लाये, इस अरसे में हजरते बिलाल रजिय़ल्लाहु अन्हु के आने का सारे मदीने में गुल हो गया कि आज हुजूर सल्लल्लाहु अलैेहि वसल्लम के मोअज्ज़िन बिलाल आये हैं।
सबने मिलकर हजरते बिलाल से दरख्वास्त की के अल्लाह के लिए एक दफा़ वह अजा़न सुना दो जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सुनाते थे, हजरते बिलाल फऱमाने लगे... दोस्तो यह मेरी ताक़त से बाहर है क्योकि मैं हुजूर की उस दुनियावी जिन्दगी में अजा़न कहा करता था जिस वक्त "#अश_हदु_अनन_मुहममदर्रसूलुल्लाह" कहता था तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सामने आंखो से देख लेता था, अब बतोओ कि कैसे देखूंगा.? मुझे इस खिदमत से माफ करो..

हर चंद लोंगो ने इसरार किया मगर हजरत बिलाल ने इंकार ही किया, बाज़ सहाबा की यह राय हुई कि हजरत बिलाल किसी का कहना न मानेंगे, तुम किसी को भेजकर हज़रत हसन व हुसैन रज़ियल्लाहु तअाला अन्हुम को बुला लाओ,  अगर वह आकर हजरते बिलाल से अज़ान की फ़रमाईश करेंगे तो बिलाल ज़रूर मान जायेंगे, क्योकि हजूर स.अ के अह्हले - बैत से हजरत बिलाल को इश्क़ है, यह सुनकर एक साहाबा हज़रत हसन व हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम को बुला लाये, हजरत हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने आकर हजरते बिलाल का हाथ पकड़ कर फ़रमाया कि ए बिलाल आज हमें भी वही अज़ान सुना दो जो हमारे नाना जान को सुनाया करते थे, हज़रत बिलाल ने ईमाम हुसैन रजियल्लाहु अन्हु को गोद में बैठा कर कहा तुम मेरे महुबूब के कलेजे के टुकडे हो, नबी के बाग के फूल हो, जो कुछ तुम कहोगे , मंजूर करुंगा, तुम्हे रंजीदा न करुंगा और फरमाया हुसैन मुझे ले चलो , जहां कहोगे अज़ान दूंगा, हज़रत हुसैन ने हज़रत बिलाल का हाथ पकडकर आपको मस्जिद की छत पर खडा किर दिया, हज़रत बिलाल ने अज़ान कहना शुरु की...... अल्लाहु अकबर, मदीना मुनव्वरा में यह वक्त अजब ग़म और सदमे का वक्त था, हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को विसाल फ़रमाये हुए एक ज़माना हुआ था आज महीनों के बाद अज़ान बिलाल की आवाज़ में सुनकर हुजूर की दूनियावी हयाते मुबारक का समां बंध गया था, हजरते बिलाल की आवाज सुनकर मदीना मुनव्वरा के बाजा़र गली कूचो से आकर लोग मस्जिद में जमा हुए, हर एक शख़्स घर से निकल आया, जिस वक्त हजरत बिलाल ने " अशहदु अन न मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह " मुंह से निकला, हजा़रहा चीखें निकली, उस वक्त रोने का कोई ठिकाना न था, औंरते रो रही थी, नन्हें बच्चे अपनी माओं से पूछते थे कि तुम बताओ कि हजरत बिलाल मोअज़्जि़न सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आ गये मगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना कब तशरीफ लायेंगे ?? हजरत बिलाल ने जब #_अशहदुअन_मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह मुंह से निकाला और हुजूर को आंखों से न देखा तो हूजुर के ग़मे हिज्र में बेहोश होकर गिर गये | बहुत देर के बाद होश में आकर उठे और रोते हुए मुल्के शाम वापस चले गये..|
✏ मदारिजुन नुबुव्व : जिल्द २ , सफा २३६

कुरबान जाओ मोहम्मद स.अ से मोहब्बत की मिसाल उस बिलाल र.अ पर जिनकी सदा पर लोग हर काम को छोड़ मस्जिद का रुख कर लेते थे, आज अज़ान के वही अल्फ़ाज़ गुंजते रहते हैं, सुबह मोअज्जिन पुकारता है कि "नींद से बेहतर नमाज़ है" लेकिन हम बेदार नहीं होते, मस्जिदों के सफ खाली रहते हैं हमें फिक्र नहीं होती, आज एक दो टके का गवैय्या कहता है की उसे अज़ान की आवाज़ सोने नहीं देती तो इसके जिम्मेदार कौन है ? हम और सिर्फ़ हम।
कयोंकि वो गवैया जानता है सुबह एक तरफ से अज़ान की सदा आती है तो एक तरफ से आरती की, एक तरफ से गुर्बाणी की तो एक तरफ से चर्च के प्रेयर की भी आती होगी, लेकिन उसे दिक्कत अज़ान से है कयोंकि मुसलमानों ने मोअज्जिन की इस सदा पर लब्बैक कहना छोड़ दिया है, आज बिलाल र.अ नहीं आएंगे, लेकिन आज भी अज़ान से वही सदा आती है जिसे सुनकर रौंगटे खड़े हो जाएं। बस आप उसे महसुस करें। और उसपर लब्बैक कहें, फिर देखें कि इन दो टके के लोगों की जबान कैसे बंद हो जाती है।

शुक्रिया