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Monday, 20 February 2017

कब्रस्तान और श्मशान की बात करने वाले के लिए मोहम्मद मेहराज का लेख।

सच्चर कमेटी रिपोर्ट के मुताबिक मुसलमान सरकारी नौकरियों में सिर्फ़ 4.9 प्रतिशत है, इसमें भी ज़्यादातर निचले पदों पर हैं। उच्च प्रशासनिक सेवाओं यानी आईएएस, आईएफएस और आईपीएस में मुसलमानों की भागीदारी सिर्फ़ 3.2 प्रतिशत है। रेलवे में 4.5 प्रतिशत मुसलमान कर्मचारी हैं जिनमें 98.7 प्रतिशत निचले पदों पर हैं।

भारत के वो राज्य जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है जिनमे प्रमुख हैं, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और असम हैं। जहाँ मुस्लिम आबादी क्रमश: 25.2 प्रतिशत, 18.5 प्रतिशत और 30.9 प्रतिशत है, वहाँ सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी क्रमश: सिर्फ़ 4.7 प्रतिशत, 7.5 प्रतिशत और 10.9 प्रतिशत है। इन राज्यों मे साक्षरता की दर भी राष्‍ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा कम है। शहरी इलाकों में स्कूल जाने वाले मुस्लिम बच्चों का प्रतिशत दलित और अनुसूचित जनजाति के बच्चों से कम है। (आंकड़े 10.साल पुराने है,अब हालात बद से बदतर हैं)

अक्सर कुछ मुस्लिम शुभचिंतक बुद्धिजीवी ताना देते हुए मिल जाते हैं कि जब मुस्लिम अपने बच्चो को आधुनिक शिक्षा देंगे ही नही तो नौकरी कैसे पाएंगे?
…दो-तीन महीने पहले एक सर्वे में खुलासा हुआ है कि मुस्लिम केबल 3% ही ग्रेजुएट हैं। ऐसा नही है कि मुस्लिम अपने बच्चो को पढ़ाना नही चाहते। मुझे नही लगता कोई भी पेरेंट्स अपने बच्चो के पैदा होते ही उनमे मजदूर, रिक्शा चालक देखेंते हो। हर माँ-बाप का सपना होता है कि उसके बच्चे वकील, डॉक्टर, टीचर, सम्वेधानिक पदो पर हों …मगर जब सामने "मजबूरियां" हो तो उनके आगे घुटने टेककर अपने बच्चो को खुद से दूर गल्फ कमाने भेजते है, सब्जी का ठेला, पंचर की दुकान, मजदूरी जैसे काम कराने पड़ जाते हैं।
और मुस्लिमो की इन "मजबूरियो" मे हमारे देश के सिस्टम के 'भेदभाव' का ही सबसे बड़ा हाथ है।
अगर भेदभाव नही है तो दलितों/आदिवासियों से बदतर जिन्दगी जी रहे मुस्लिम को रंगानाथ मिश्र रिपोर्ट अनुसार 15% आरक्षण क्यों नही देते? अगर भेदभाव नही है तो बैंक् मुस्लिम नाम देखकर लोन रिजेक्ट क्यों कर देती है ? अगर भेदभाव नही है तो मौलाना जोहर यूनिवर्सिटी की फाइल पास करने बाले राज्यपाल अजीज कुरैशी को क्यों पद से हटा दिया जाता है? अगर भेदभाव नही है तो क्यों मुस्लिम मोहल्लो मे पीने का साफ़ पानी, सड़के और मूलभूत सुविधाए उस तरह की नही है जिस तरह बहुसंख्यको के मोहल्लो में होती हैं?अगर भेदभाव नही है तो क्यों मुसलमानो की सबसे सेक्युलर सरकार जामियाँ यूनिवर्सिटी की जमीन केस पर सुप्रीम कोर्ट चली जाती है और रामदेव को कई एकड़ जमीन मुहैया करा देती है?
इस "भेदभाव" की खाई तो इतनी गहरी है साहब कि मुस्लिम पर चाकू पकड़ा जाये तो आतंकी और धर्म विशेष के लोग दुश्मन देश को जासूसी करते पकड़े जाएँ तो आरोपी। सेम केस मे अफजल/मेमन को फांसी दे दी जाती है और साध्वी प्रज्ञा/बाबू बजर्नी को जमानत?। ( भेदभाव पर लिखते-लिखते अंगूठे घिस जायेंगे )

…रही बात उत्तर प्रदेश में कब्रिस्तान/श्मसान मे भेदभाव की तो गुजरात में मुसलमानो को जला दिया गया था। और अखिलेश सरकार ने यू.पी में दादरी/मुज्जफरनगर/बिजनौर जैसे छोटे-बड़े 300 से ज्यादा दंगो मे मारे गये मुसलमानों को दफनाने की सुविधा दे दी है… अब इसे कुछ लोग भेदभाव समझें? मुसलमान अहसान समझें? या सरकार का कुकर्मो पर पर्दा? यह अपनी अपनी समझ है.

-मोहम्मद मेहराज

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